Sunday, June 23, 2024

यादें

 जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है l

खपरैल से पानी का, रिसाव याद आता है ll


        दिल मेरा कहता है, कि उम्र गुजार दू वहां l

       जब ठंड में सुलगता, अलाव याद आता है ll


चंद पैसों के लिए, मैं निकला अपने गांव से l

गुजर रहा हूं मैं, मुश्किल वक़्त के पड़ाव से ll 


       कुछ नहीं रखा, इस शहर की भीड़ भाड में l 

      ऊब गया हूं मैं, अब तो वक़्त के ठहराव से ll 


आज भी उन नहरों का, बहाव याद आता है l 

 जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll


       बैठ पिता के कंधों पर, खेतों में जाना याद है l

       माँ के हाथों से बना, चूल्हे का खाना याद है ll


छुप कर मां से मुझको, नहरों में नहाना याद है l

भोर समय में मुझको, भैंसों को चराना याद है ll


 सांझ समय में मंद हवा का, बहाव याद आता है l

       जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll


एक सुकूं सा मिलता था, गांव की हरियाली में l

मजा चाय का आता था, कुल्हाड़ वाली प्याली में ll


   झूले डाला करते थे, आंगन के पेड़ों की डाली में l

 मजा बहुत आया करता था, दादीजी की गाली में ll


झूले वाली डाली का, वो झुकाव याद आता है l 

जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll


दोपहर धूप में खेलकर, दादी से डरना याद है l

रोज शाम को दादाजी से, बातें करना याद है ll


     पेड़ हिलाकर जेबों में, जामुन का भरना याद है l

      खेल खेल में आपस में, जमकर लड़ना याद है ll 


लड़कर फिर मिल जाने का, स्वभाव याद आता है l

जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll






No comments:

Post a Comment