जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है l
दिल मेरा कहता है, कि उम्र गुजार दू वहां l
जब ठंड में सुलगता, अलाव याद आता है ll
चंद पैसों के लिए, मैं निकला अपने गांव से l
गुजर रहा हूं मैं, मुश्किल वक़्त के पड़ाव से ll
कुछ नहीं रखा, इस शहर की भीड़ भाड में l
ऊब गया हूं मैं, अब तो वक़्त के ठहराव से ll
आज भी उन नहरों का, बहाव याद आता है l
जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll
बैठ पिता के कंधों पर, खेतों में जाना याद है l
माँ के हाथों से बना, चूल्हे का खाना याद है ll
छुप कर मां से मुझको, नहरों में नहाना याद है l
भोर समय में मुझको, भैंसों को चराना याद है ll
सांझ समय में मंद हवा का, बहाव याद आता है l
जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll
एक सुकूं सा मिलता था, गांव की हरियाली में l
मजा चाय का आता था, कुल्हाड़ वाली प्याली में ll
झूले डाला करते थे, आंगन के पेड़ों की डाली में l
मजा बहुत आया करता था, दादीजी की गाली में ll
झूले वाली डाली का, वो झुकाव याद आता है l
जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll
दोपहर धूप में खेलकर, दादी से डरना याद है l
रोज शाम को दादाजी से, बातें करना याद है ll
पेड़ हिलाकर जेबों में, जामुन का भरना याद है l
खेल खेल में आपस में, जमकर लड़ना याद है ll
लड़कर फिर मिल जाने का, स्वभाव याद आता है l
जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll
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