Sunday, June 23, 2024

प्रेम राही

 एक घने कोहरे से, गुजर रहे है हम इन दिनों l

नजरों के सामने होकर भी, नजर वो आते नहीं ll


दो कदम बढ़ाकर रुक गए वो, और हम चलते रहे l

जो ठहर जाते हम भी, तो ठोकर शायद खाते नहीं ll


राह-ए-इश्क़ भी है अजीब, किस मोड़ पर ले आई l

ग़र कयास होता हमे, इस राह पर कभी जाते नहीं ll


कसूर कहूं इसे दिल का या, ये नजरों की खता है l

हाल ये होता न मेरा, ग़र नजरें हम मिलाते नहीं ll


आखिरी उम्मीद से देखा था, उस बेवफा की तरफ l

नाउम्मीद न होते हम भी, ग़र नजरें वो चुराते नहीं ll


बर्बाद हुए हम तो कुछ ग़म नहीं, खता भी हमारी थी l

ग़र खता न होती इसकी, दिल को हम यूं जलाते नहीं ll


बहुत दूर तलक आ चुके थे, हम इश्क की राह पर l

कोई राह बची होती, तो इश्क में खुद को मिटाते नहीं ll




 













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