एक घने कोहरे से, गुजर रहे है हम इन दिनों l
नजरों के सामने होकर भी, नजर वो आते नहीं ll
दो कदम बढ़ाकर रुक गए वो, और हम चलते रहे l
जो ठहर जाते हम भी, तो ठोकर शायद खाते नहीं ll
राह-ए-इश्क़ भी है अजीब, किस मोड़ पर ले आई l
ग़र कयास होता हमे, इस राह पर कभी जाते नहीं ll
कसूर कहूं इसे दिल का या, ये नजरों की खता है l
हाल ये होता न मेरा, ग़र नजरें हम मिलाते नहीं ll
आखिरी उम्मीद से देखा था, उस बेवफा की तरफ l
नाउम्मीद न होते हम भी, ग़र नजरें वो चुराते नहीं ll
बर्बाद हुए हम तो कुछ ग़म नहीं, खता भी हमारी थी l
ग़र खता न होती इसकी, दिल को हम यूं जलाते नहीं ll
बहुत दूर तलक आ चुके थे, हम इश्क की राह पर l
कोई राह बची होती, तो इश्क में खुद को मिटाते नहीं ll
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