Tuesday, November 19, 2024

खोज

 सोच से परे हो जो, मैं एसी बात सोचता हूं 

दुनियां से दूर, एक हसीन रात खोजता हूं।

भरी दोपहरी में भी, छांव का अहसास हो 

ख्वाब लगे जो, मैं एसी हयात खोजता हूं 

जहाँ रोशनी घबराती हो, अंधेरों के खौफ से 

उस गहरे सन्नाटे में, मैं एक राग खोजता हूं 

ठहरा गया संसार जहां, वहीं मेरी शुरुआत है 

पत्थर फेंक के, आसमाँ में सुराख खोजता हूं 

मचल जो जाए दिल, कुछ करने की चाह में 

असंभव है जो होना, मैं एसी बात खोजता हूं 

भीड़ में जब होता हूं, मैं तभी अकेला रोता हूं 

वीरान बस्तियों में, अक्सर बारात खोजता हूं 

कहते है यही सब, कि एक नई सुबह आएगी 

नींद से है नफरत, मैं रूहानी रात खोजता हूं 

जेब से फकीर हूं, पर शौक मेरे नवाबी है 

रेत का महल मेरा, औऱ मैं बरसात खोजता हूं 







Saturday, November 16, 2024

वक़्त से तेज

 न खेल मेरी हसरतों से, ए वक़्त मैं तेरा तकाजा हूं 

खयालों की दुनियां मेरी भी है, मैं जिसका राजा हूं 

ग़र जो बहक गया मैं, खुद को ही झोंक दूँगा 

भागूंगा इस कदर मैं, कि तुझको भी रोक दूँगा 

किस्मत

विचारों का समुंदर है, तो उम्मीद की है नांव भी 

तपती सी धूप भी है औऱ दरख़्तों की है छांव भी 

कैसे कह दूँ कि,  लकीरों का मोहताज हूं मैं 

करीब ही है साहिल, औऱ दरिया में है बहाव भी 

शक्ति

कभी ग़र लगे तुझे, कि जो मिला वो कम है 

जीत ले जहान को, ग़र सच में तुझमे दम है 

रखकर टीस दिल में, कायरों सा न बन तू 

तू शेर है दहाड़ दे, किस बात का वहम है

ग़र न कर सके हिम्मत, ये ख्याल त्याग दे 

जो मिला बहुत है, बस यही तेरा चरम है 

झूठी दलीलें नापसंद है, दुनियां को प्यारे 

है हिम्मत तो दिखा दे, कि तुम तुम हो, हम हम है 

 













Saturday, November 9, 2024

फकीर दिल

 फकीर इस दिल ने मेरे, अब ये कैसी हसरत पाली है

बाजार में लाकर खड़ा कर दिया, जेब मेरी खाली है 


सपनें

 सपनों के आगे नींद ने, फिर से शिकस्त मानी

आँखें बयां कर रही हैं, बीती रात की कहानी

दिल में जगी अलख, बेताबी मेरी दिखाती हैं

रात भर खामोशियों से, चली है जंग रूहानी 










नींद

 रात भर ख़ामोशियों से बात मेरी होती है,

तन्हाइयों से, गहरी मुलाक़ात मेरी होती है।

इन वीरान लम्हों में, संग्राम दिल से चलता है,

दिल के आगे कहाँ, कुछ बिसात मेरी होती है।


सपनों की दुनिया में, ढूँढता हूँ ख़ुद को,

अनजानी राहों में, हर रात मेरी होती है।

जैसे कुछ खोया हो, किसी अंधेरे कोने में,

गुमशुदा तलाश में, हर रात मेरी खोती है।


देखता हूँ आसमां को जब, कुछ तारे टूटते हैं,

उम्मीदें जाग उठती हैं, पर ख़याल रूठते हैं।

इन बुझती रोशनी में, शायद एक सुबह मिले,

बस इसी कशमकश में, हर रात मेरी होती है।


इस खामोश रात में, कुछ सवाल जागते हैं,

जिनके जवाब पाने को, अरमान भागते हैं।

शायद उन उत्तरों का, इंतज़ार ही है क़िस्मत,

इस अधूरे इंतजार में हर रात मेरी सोती है।


Monday, November 4, 2024

लहर

 

खोज में हूं सुकून की, शोर दिल के अंदर है

कैसा है ये फलसफा, न जाने कैसा मंजर है

उस मोड़ पर आ गया हूं, जहाँ छोर ही नहीं

उम्मीदों की लहरें हैं, और सामने समंदर है


हर लहर में छिपा हुआ है, एक नया असर

खुद की तलाश का,अब पूरा हुआ सफर 

डूबने की हसरतें नहीं, तैरने की चाह है 

समंदर की गहराई में, मिला एक रहगुज़र 




तन्हाई

खोज में हूं सुकून की, शोर दिल के अंदर है 

कैसा है ये फलसफा, न जाने कैसा मंजर है 

उस मोड़ पर आ गया हूं, जहाँ छोर ही नहीं 

डूबने की ख्वाहिश है, औऱ सामने समुंदर है 







Sunday, November 3, 2024

ख्वाहिशें

 लंबी नहीं है राह इसकी, फकत मुश्किल जुरूर है 

चार दिन की जिंदगी में, किस बात का गुरूर है 

ख्वाहिशों का मंजर, खत्म होता नहीं है क्यों जब

खाली हाथ जाना ही, इस जहान का दस्तूर है 


खण्डहर बन गए है, जाने कितने ही महल 

जो कभी किसी की, शान बयां करते थे 

चल दिये दुनियां से, सब कुछ वो छोड़कर 

दौलत पे अपनी जो, गुमान किया करते थे 



प्रयास

 गिर चुका सौ बार तो क्या, एक प्रयास औऱ सही 

कई पोशाकें मैली हो गई, एक लिबास औऱ सही 

अब के गिरा जो फिर सीखूंगा, एक सबक नया 

कई उम्मीदें कायम है, क्यों न एक कयास औऱ सही 




तिमिर

 गहन अंधकार है, या पाप का प्रसार है

एक बड़े विनाश का, लग रहा आसार है 

गरज रहे मेघ औऱ, काली घटाऐं छाई है 

समुद्र है उफान पर, जीवों में हाहाकार है 

कौन बनेगा राम, हर दिल में छुपा रावन है 

बुराई की अच्छाई को, खुली हुई ललकार है 

कण कण में बसे है राम, जा बता दे रावन को 

जाग मिटा दे गहन तिमिर, वक़्त की दरकार है 



वक़्त

 आहिस्ता गुजर ए वक़्त सम्हलने का मौका तो दे 

माना कि गलत है राह पर बदलने का मौका तो दे 

औऱ कितना खेल बाकी अभी अब थक चुका हूं मैं 

रोशनी चाहते है दिये सी पर जलने का मौका तो दे 





संसार सार

 कोई कहता चला जा रहा है 

कोई सहता चला जा रहा है 

कोई खुद को समेटने मे लिप्त है 

तो कोई ढहता चला जा रहा है 


कोई खुद में ही खो रहा है 

कोई दूर खुद से हो रहा है 

किसी की नींदे उड़ चुकी है 

तो कोई चैन से सो रहा है 


कोई किसी की सुनता नहीं 

तो कोई कुछ कहता नहीं 

कोई अरमान पूरे कर रहा है 

कोई ख्वाब तक बुनता नहीं 


कोई खुल के हंस रहा है 

किसी का रोना दुश्वार है 

यही है नियम दुनियां का 

संसार का यही सार है 


मजबूर

 बहुत कुछ है दिल में फिर क्यों कह नहीं पाता 

दर्द छुपाने की आदत है फिर क्यों सह नहीं पाता 

क्या किसी को खुशियां देना ही गुनाह है मेरा 

यदि हां तो फिर बेकसूर क्यों मैं रह नहीं पाता 


गीली आंखे बताती है कि मेरी मुस्कान झूठी है 

आंख तक आ जाता है आंसू पर बह नहीं पाता 

न जाने किस मिट्टी से बनाया है खुदा ने मुझे 

कई बार कुरेदा जाता हूं पर मैं ढह नहीं पाता 






वृक्षारोपण

 उसकी ही छांव तले आराम करने लगे 

जिसे काटते- काटते थक गए थे, बेपीर 

बेशर्मी की इन्तेहाँ से, वाकिफ जो न थे 

न कुल्हाड़ी रूकी,न ही फलों का गिरना 


फिर एक आखिरी प्रहार भी कर दिया 

और धराशायी हो गया धरा का रक्षक 

बेजुबां, शायद कुछ कहना चाह रहा था 

पर क्यूं स्वार्थी कानों तक बात न पहुंची 


टुकड़े टुकड़े कर दिए हर एक शाख के उसने

जलती धूप में खुद भी पसीना पसीना हो गया 

शाख के हर एक टुकड़े की अहमियत थी, कि 

चूल्हे धरी कढ़ाई को भी आग का इंतजार था 


वो अब, हमसे शायद ही कुछ उम्मीद रखते हों 

पर हम तो उनके बिना निश्चित ही नाउम्मीद है 


क्यों न हम सब मिलकर

अब उसको न्याय दिलाए 

हर एक चोट के बदले उसकी

हम सौ - सौ वृक्ष लगाएं 




पतझड़

 बेज़ान हो गया वो, कभी जो था हरा भरा। 

एक पत्ता टूटा पेड़ से, और ज़मीं पर जा गिरा।।   


      एक अरसे से, शोभायमान था जो शाख पर। 

     आज सूख कर गिरा वो, अंततः धूल से भरा।। 


बहती हवाओं संग खेलना ही, पसंद था उसे। 

आज उन्हीं हवाओं संग, वो बहता चला गया।। 


       रीत है ये दुनियां की, इसे कौन बदल सका। 

      जाते जाते ही ये बात वो कहता चला गया।।  


सावन फिर से आएगा,और शाख फिर भरेगी।  

पतझड़ तक ही शायद, इसकी कमी खलेगी।।  


    मुकाम इसका है अब, कि मिट्टी में मिल जाना है।  

    फिर से मिलेगा नवजीवन, चक्र को दोहराना है।।  


               


फ़र्ज़

 कुछ फर्ज थे मेरे, जिन्हें यूं निभाता रहा। 

खुद को भुलाकर, हर दर्द छुपाता रहा।।

        

       आंसुओं की बूंदें, दिल में कहीं दबी रहीं। 

        दुनियां के सामने, व्यर्थ मुस्कुराता रहा।।   


रातें लंबी थीं, पर नींद कभी भी आई नहीं। 

चाहतें भी थीं, पर ज़ाहिर कभी हो पाई नहीं।।  


     हर ख़्वाब अधूरा, दिल में कहीं समाया रहा। 

       फर्ज की आग में, मैं खुद को जलाता रहा।।


न कभी शिकायत की, अपने दर्द की मैंने। 

हर जख्म पर, मरहम वक्त ने लगा दिया।। 


        जिम्मेदारियों के बोझ तले, झुका रहा मैं।  

      सोया ही था कि, ख्वाब ने फिर जगा दिया।। 


कभी सोचा ही नहीं, क्या पाया, क्या खो दिया। 

जीवनरूपी खेत में, जो बीज फर्ज का बो दिया।। 

 

    बो कर बीज फ़र्ज़ का, मैं दर्द को उगाता रहा। 

    के कुछ फर्ज थे मेरे, जिन्हें मैं यूं निभाता रहा।। 

    

शिवाजी महाराज

 काट काट सर बैरियों के, 

लगाए लहू ललाट पर। 

घाट घाट का नीर पिया, 

रुका नहीं एक घाट पर।। 

जीत जीत हर जंग अभीत, 

तब तक न विचलित हुआ।  

हाट हाट हर एक सम्राट, 

झुका नहीं जो ठाठ पर।।  







उम्मीद


दिल में है जिंदा, उम्मीद की कहानी अभी।  

थक गया हूं बेशक, पर हार न मानी अभी।। 


काटों भरी राह में, ज़ख्म मिल चुके हैं कई।   

रुकने का इरादा नहीं, चल रही रवानी अभी।।  

  

आंधियों ने कोशिश की, बुझाने की बार-बार। 

जल रहा है सीने में, दिया एक रूहानी अभी।।  

  

थकान है बदन में, और मेरी आंखों में नींद है। 

सुलग रही है दिल में, चिंगारी इक पुरानी अभी।।  

  

हार अपनी मानूं मैं कैसे, ये जंग मेरी खुद से है। 

जीतने की कसमें हैं, मंजिल भी है पानी अभी।। 


जारी रहेगा सिलसिला, वक़्त से छिड़ी जंग का। 

ख्वाबों के उफान में है, डूबी मेरी कहानी अभी।।


दिल में है जिंदा, उम्मीद की कहानी अभी।  

थक गया हूं बेशक, पर हार न मानी अभी।।