Sunday, November 3, 2024

मजबूर

 बहुत कुछ है दिल में फिर क्यों कह नहीं पाता 

दर्द छुपाने की आदत है फिर क्यों सह नहीं पाता 

क्या किसी को खुशियां देना ही गुनाह है मेरा 

यदि हां तो फिर बेकसूर क्यों मैं रह नहीं पाता 


गीली आंखे बताती है कि मेरी मुस्कान झूठी है 

आंख तक आ जाता है आंसू पर बह नहीं पाता 

न जाने किस मिट्टी से बनाया है खुदा ने मुझे 

कई बार कुरेदा जाता हूं पर मैं ढह नहीं पाता 






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