लंबी नहीं है राह इसकी, फकत मुश्किल जुरूर है
चार दिन की जिंदगी में, किस बात का गुरूर है
ख्वाहिशों का मंजर, खत्म होता नहीं है क्यों जब
खाली हाथ जाना ही, इस जहान का दस्तूर है
खण्डहर बन गए है, जाने कितने ही महल
जो कभी किसी की, शान बयां करते थे
चल दिये दुनियां से, सब कुछ वो छोड़कर
दौलत पे अपनी जो, गुमान किया करते थे
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