Tuesday, November 19, 2024

खोज

 सोच से परे हो जो, मैं एसी बात सोचता हूं 

दुनियां से दूर, एक हसीन रात खोजता हूं।

भरी दोपहरी में भी, छांव का अहसास हो 

ख्वाब लगे जो, मैं एसी हयात खोजता हूं 

जहाँ रोशनी घबराती हो, अंधेरों के खौफ से 

उस गहरे सन्नाटे में, मैं एक राग खोजता हूं 

ठहरा गया संसार जहां, वहीं मेरी शुरुआत है 

पत्थर फेंक के, आसमाँ में सुराख खोजता हूं 

मचल जो जाए दिल, कुछ करने की चाह में 

असंभव है जो होना, मैं एसी बात खोजता हूं 

भीड़ में जब होता हूं, मैं तभी अकेला रोता हूं 

वीरान बस्तियों में, अक्सर बारात खोजता हूं 

कहते है यही सब, कि एक नई सुबह आएगी 

नींद से है नफरत, मैं रूहानी रात खोजता हूं 

जेब से फकीर हूं, पर शौक मेरे नवाबी है 

रेत का महल मेरा, औऱ मैं बरसात खोजता हूं 







Saturday, November 16, 2024

वक़्त से तेज

 न खेल मेरी हसरतों से, ए वक़्त मैं तेरा तकाजा हूं 

खयालों की दुनियां मेरी भी है, मैं जिसका राजा हूं 

ग़र जो बहक गया मैं, खुद को ही झोंक दूँगा 

भागूंगा इस कदर मैं, कि तुझको भी रोक दूँगा 

किस्मत

विचारों का समुंदर है, तो उम्मीद की है नांव भी 

तपती सी धूप भी है औऱ दरख़्तों की है छांव भी 

कैसे कह दूँ कि,  लकीरों का मोहताज हूं मैं 

करीब ही है साहिल, औऱ दरिया में है बहाव भी 

शक्ति

कभी ग़र लगे तुझे, कि जो मिला वो कम है 

जीत ले जहान को, ग़र सच में तुझमे दम है 

रखकर टीस दिल में, कायरों सा न बन तू 

तू शेर है दहाड़ दे, किस बात का वहम है

ग़र न कर सके हिम्मत, ये ख्याल त्याग दे 

जो मिला बहुत है, बस यही तेरा चरम है 

झूठी दलीलें नापसंद है, दुनियां को प्यारे 

है हिम्मत तो दिखा दे, कि तुम तुम हो, हम हम है 

 













Saturday, November 9, 2024

फकीर दिल

 फकीर इस दिल ने मेरे, अब ये कैसी हसरत पाली है

बाजार में लाकर खड़ा कर दिया, जेब मेरी खाली है 


सपनें

 सपनों के आगे नींद ने, फिर से शिकस्त मानी

आँखें बयां कर रही हैं, बीती रात की कहानी

दिल में जगी अलख, बेताबी मेरी दिखाती हैं

रात भर खामोशियों से, चली है जंग रूहानी 










नींद

 रात भर ख़ामोशियों से बात मेरी होती है,

तन्हाइयों से, गहरी मुलाक़ात मेरी होती है।

इन वीरान लम्हों में, संग्राम दिल से चलता है,

दिल के आगे कहाँ, कुछ बिसात मेरी होती है।


सपनों की दुनिया में, ढूँढता हूँ ख़ुद को,

अनजानी राहों में, हर रात मेरी होती है।

जैसे कुछ खोया हो, किसी अंधेरे कोने में,

गुमशुदा तलाश में, हर रात मेरी खोती है।


देखता हूँ आसमां को जब, कुछ तारे टूटते हैं,

उम्मीदें जाग उठती हैं, पर ख़याल रूठते हैं।

इन बुझती रोशनी में, शायद एक सुबह मिले,

बस इसी कशमकश में, हर रात मेरी होती है।


इस खामोश रात में, कुछ सवाल जागते हैं,

जिनके जवाब पाने को, अरमान भागते हैं।

शायद उन उत्तरों का, इंतज़ार ही है क़िस्मत,

इस अधूरे इंतजार में हर रात मेरी सोती है।


Monday, November 4, 2024

लहर

 

खोज में हूं सुकून की, शोर दिल के अंदर है

कैसा है ये फलसफा, न जाने कैसा मंजर है

उस मोड़ पर आ गया हूं, जहाँ छोर ही नहीं

उम्मीदों की लहरें हैं, और सामने समंदर है


हर लहर में छिपा हुआ है, एक नया असर

खुद की तलाश का,अब पूरा हुआ सफर 

डूबने की हसरतें नहीं, तैरने की चाह है 

समंदर की गहराई में, मिला एक रहगुज़र 




तन्हाई

खोज में हूं सुकून की, शोर दिल के अंदर है 

कैसा है ये फलसफा, न जाने कैसा मंजर है 

उस मोड़ पर आ गया हूं, जहाँ छोर ही नहीं 

डूबने की ख्वाहिश है, औऱ सामने समुंदर है 







Sunday, November 3, 2024

ख्वाहिशें

 लंबी नहीं है राह इसकी, फकत मुश्किल जुरूर है 

चार दिन की जिंदगी में, किस बात का गुरूर है 

ख्वाहिशों का मंजर, खत्म होता नहीं है क्यों जब

खाली हाथ जाना ही, इस जहान का दस्तूर है 


खण्डहर बन गए है, जाने कितने ही महल 

जो कभी किसी की, शान बयां करते थे 

चल दिये दुनियां से, सब कुछ वो छोड़कर 

दौलत पे अपनी जो, गुमान किया करते थे 



प्रयास

 गिर चुका सौ बार तो क्या, एक प्रयास औऱ सही 

कई पोशाकें मैली हो गई, एक लिबास औऱ सही 

अब के गिरा जो फिर सीखूंगा, एक सबक नया 

कई उम्मीदें कायम है, क्यों न एक कयास औऱ सही 




तिमिर

 गहन अंधकार है, या पाप का प्रसार है

एक बड़े विनाश का, लग रहा आसार है 

गरज रहे मेघ औऱ, काली घटाऐं छाई है 

समुद्र है उफान पर, जीवों में हाहाकार है 

कौन बनेगा राम, हर दिल में छुपा रावन है 

बुराई की अच्छाई को, खुली हुई ललकार है 

कण कण में बसे है राम, जा बता दे रावन को 

जाग मिटा दे गहन तिमिर, वक़्त की दरकार है 



वक़्त

 आहिस्ता गुजर ए वक़्त सम्हलने का मौका तो दे 

माना कि गलत है राह पर बदलने का मौका तो दे 

औऱ कितना खेल बाकी अभी अब थक चुका हूं मैं 

रोशनी चाहते है दिये सी पर जलने का मौका तो दे 





संसार सार

 कोई कहता चला जा रहा है 

कोई सहता चला जा रहा है 

कोई खुद को समेटने मे लिप्त है 

तो कोई ढहता चला जा रहा है 


कोई खुद में ही खो रहा है 

कोई दूर खुद से हो रहा है 

किसी की नींदे उड़ चुकी है 

तो कोई चैन से सो रहा है 


कोई किसी की सुनता नहीं 

तो कोई कुछ कहता नहीं 

कोई अरमान पूरे कर रहा है 

कोई ख्वाब तक बुनता नहीं 


कोई खुल के हंस रहा है 

किसी का रोना दुश्वार है 

यही है नियम दुनियां का 

संसार का यही सार है 


मजबूर

 बहुत कुछ है दिल में फिर क्यों कह नहीं पाता 

दर्द छुपाने की आदत है फिर क्यों सह नहीं पाता 

क्या किसी को खुशियां देना ही गुनाह है मेरा 

यदि हां तो फिर बेकसूर क्यों मैं रह नहीं पाता 


गीली आंखे बताती है कि मेरी मुस्कान झूठी है 

आंख तक आ जाता है आंसू पर बह नहीं पाता 

न जाने किस मिट्टी से बनाया है खुदा ने मुझे 

कई बार कुरेदा जाता हूं पर मैं ढह नहीं पाता 






वृक्षारोपण

 उसकी ही छांव तले आराम करने लगे 

जिसे काटते- काटते थक गए थे, बेपीर 

बेशर्मी की इन्तेहाँ से, वाकिफ जो न थे 

न कुल्हाड़ी रूकी,न ही फलों का गिरना 


फिर एक आखिरी प्रहार भी कर दिया 

और धराशायी हो गया धरा का रक्षक 

बेजुबां, शायद कुछ कहना चाह रहा था 

पर क्यूं स्वार्थी कानों तक बात न पहुंची 


टुकड़े टुकड़े कर दिए हर एक शाख के उसने

जलती धूप में खुद भी पसीना पसीना हो गया 

शाख के हर एक टुकड़े की अहमियत थी, कि 

चूल्हे धरी कढ़ाई को भी आग का इंतजार था 


वो अब, हमसे शायद ही कुछ उम्मीद रखते हों 

पर हम तो उनके बिना निश्चित ही नाउम्मीद है 


क्यों न हम सब मिलकर

अब उसको न्याय दिलाए 

हर एक चोट के बदले उसकी

हम सौ - सौ वृक्ष लगाएं 




पतझड़

 बेज़ान हो गया वो, कभी जो था हरा भरा। 

एक पत्ता टूटा पेड़ से, और ज़मीं पर जा गिरा।।   


      एक अरसे से, शोभायमान था जो शाख पर। 

     आज सूख कर गिरा वो, अंततः धूल से भरा।। 


बहती हवाओं संग खेलना ही, पसंद था उसे। 

आज उन्हीं हवाओं संग, वो बहता चला गया।। 


       रीत है ये दुनियां की, इसे कौन बदल सका। 

      जाते जाते ही ये बात वो कहता चला गया।।  


सावन फिर से आएगा,और शाख फिर भरेगी।  

पतझड़ तक ही शायद, इसकी कमी खलेगी।।  


    मुकाम इसका है अब, कि मिट्टी में मिल जाना है।  

    फिर से मिलेगा नवजीवन, चक्र को दोहराना है।।  


               


फ़र्ज़

 कुछ फर्ज थे मेरे, जिन्हें यूं निभाता रहा। 

खुद को भुलाकर, हर दर्द छुपाता रहा।।

        

       आंसुओं की बूंदें, दिल में कहीं दबी रहीं। 

        दुनियां के सामने, व्यर्थ मुस्कुराता रहा।।   


रातें लंबी थीं, पर नींद कभी भी आई नहीं। 

चाहतें भी थीं, पर ज़ाहिर कभी हो पाई नहीं।।  


     हर ख़्वाब अधूरा, दिल में कहीं समाया रहा। 

       फर्ज की आग में, मैं खुद को जलाता रहा।।


न कभी शिकायत की, अपने दर्द की मैंने। 

हर जख्म पर, मरहम वक्त ने लगा दिया।। 


        जिम्मेदारियों के बोझ तले, झुका रहा मैं।  

      सोया ही था कि, ख्वाब ने फिर जगा दिया।। 


कभी सोचा ही नहीं, क्या पाया, क्या खो दिया। 

जीवनरूपी खेत में, जो बीज फर्ज का बो दिया।। 

 

    बो कर बीज फ़र्ज़ का, मैं दर्द को उगाता रहा। 

    के कुछ फर्ज थे मेरे, जिन्हें मैं यूं निभाता रहा।। 

    

शिवाजी महाराज

 काट काट सर बैरियों के, 

लगाए लहू ललाट पर। 

घाट घाट का नीर पिया, 

रुका नहीं एक घाट पर।। 

जीत जीत हर जंग अभीत, 

तब तक न विचलित हुआ।  

हाट हाट हर एक सम्राट, 

झुका नहीं जो ठाठ पर।।  







उम्मीद


दिल में है जिंदा, उम्मीद की कहानी अभी।  

थक गया हूं बेशक, पर हार न मानी अभी।। 


काटों भरी राह में, ज़ख्म मिल चुके हैं कई।   

रुकने का इरादा नहीं, चल रही रवानी अभी।।  

  

आंधियों ने कोशिश की, बुझाने की बार-बार। 

जल रहा है सीने में, दिया एक रूहानी अभी।।  

  

थकान है बदन में, और मेरी आंखों में नींद है। 

सुलग रही है दिल में, चिंगारी इक पुरानी अभी।।  

  

हार अपनी मानूं मैं कैसे, ये जंग मेरी खुद से है। 

जीतने की कसमें हैं, मंजिल भी है पानी अभी।। 


जारी रहेगा सिलसिला, वक़्त से छिड़ी जंग का। 

ख्वाबों के उफान में है, डूबी मेरी कहानी अभी।।


दिल में है जिंदा, उम्मीद की कहानी अभी।  

थक गया हूं बेशक, पर हार न मानी अभी।। 

Sunday, June 23, 2024

नई सुबह

 ढल गई रात अब जाग जाग 

इक नई सुबह है भाग भाग 

नाकामी के तुझ पर जो लगे 

तू आज मिटा हर दाग दाग 

इक नई सुबह है भाग भाग 

इक नई सुबह है भाग भाग 

आँखों को अपनी भींच तू 

सपनों को अपने सींच तू 

मेहनत के पसीने से तेरे 

खिल जाए तेरा बाग बाग

इक नई सुबह है भाग भाग

इक नई सुबह है भाग भाग 

डर के दरवाजे तोड़ कर 

दुनिया को पीछे छोड़ कर 

वक़्त से आगे तू निकल जा 

वक़्त से पहले दौड़ कर 

जाकर खुद को झोंक दे 

संशय में लगा दे आग आग 

इक नई सुबह है भाग भाग

इक नई सुबह है भाग भाग

बाधाएँ मिलेंगी बेशक तुझको 

बाधाओं से आंखें चार कर 

एक जोश को भरकर दिल में 

बाधा पर अपनी वार कर 

जीत तेरी होगी निश्चित ही 

कायरता अपनी त्याग त्याग 

इक नई सुबह है भाग भाग

इक नई सुबह है भाग भाग











राहें

 कुछ राहें अतीत की शायद l

          आज भी मेरी राह तकती है ll

सिर्फ कहने को जिंदा है अब l

          मुर्दों सी हुई हमारी हस्ती है ll

गुजरे हुए हसीं लम्हे l

         लौटकर फिर क्यों आते नहीं ll

यादें जिसकी अक्सर ही l

            तन्हाई में हमे डसती है ll

बेशकीमती है जब वक़्त 

          इस दुनिया में न जाने क्यों ll

तन्हाई भरे इस दिल की l

           कीमत इतनी सस्ती हैं ll

अल्फाजों के समुन्दर में l

         उतर कर जब देखा मैंने ll

हालात ए दिल बयां करे l

        जो एसा लफ्ज न दिखा ll

एक गहन तन्हाई का पैग़ाम मिला हमे जिसे कि l

इस कोरे दिल पर था मुकद्दर ने इस कदर लिखा ll

अब तो वीरान सी हुई l

        दिल कि हमारी बस्ती हैं ll


संस्मरण प्रकृति प्रेमी

 ढलते हुए सूरज के साथ दिन का उजाला धीरे धीरे अंधेरे के आगोश में समाता जाता है l नदी का एक सुनसान तट जो कि रात के वक़्त एसा मालूम होता है कि मानो अपने भीतर हजारों रहस्य समेटे हो और बहुत कुछ जाहिर करना चाहता हो l 

मेरे घर से कुछ दूरी पर नदी का तट है जब कभी भी निराश होता हूं या किसी बात से आहत होता हूं तो अक्सर नदी का ये तट ही मेरा सबसे अच्छा हमसफर साबित होता है l 

अक्सर शाम के वक़्त जब दिन भर की भागदौड़ से परेशान होकर मैं थका हुआ महसूस करता हूं तो यहीं चला आता हूं l निसंदेह यहां आने से मुझे काफी ऊर्जा और स्फूर्ति प्राप्त होती हैं l मैं अपनी आंखों को बंद कर के एकदम निश्चिन्त हो जाता हूँ जैसे कि बस अब जीवन में सब कुछ पा लिया हो l 

मैं यहां पर जो कुछ भी महसूस करता हूं उसे बता पाना निश्चित रूप से असंभव है फिर भी कुछ सुखद अनुभूतियों से रुबरु करवाना आवश्यक समझता हूं l

बादलों की लालिमा का सुहाना दृश्य जो ढलते हुए सूरज की वज़ह से धीरे धीरे बनता है और फिर दिन का उजाला सूरज के डूब जाने से अंधेरे में परिवर्तित हो जाता है l ये वो वक़्त होता है जब सभी जीव जंतु एवं पंछी अपने अपने ठिकानों पर पहुंच कर विश्राम करने लगते है और एसा लगता है मानो पूरा वातावरण एकदम शांत सा होकर भी जैसे बहुत कुछ कहना चाहता हो और मैं भी जुट जाता हूँ इस खामोशी को समझने में इनसे बाते करने में l

शाम का हो वक़्त और, नदी का किनारा हो 

कोई न हो आसपास, सूना हर नज़ारा हो 

आंखें मूंद बैठ जा, हवाओं की तू मैं गोद में 

दिल में छुपे ग़म से, पाना जब छुटकारा हो 


मैं पलकों को हल्का सा मूंदकर रात के वक़्त नदी के किनारे बैठता हूं l नदी के किनारे बहने वाली हवा के शीतल मंद झोंके जैसे ही मेरे शरीर को स्पर्श करते है ठीक उसी वक़्त मेरे भीतर से भी एक प्रवाह बाहर की ओर होने लगता है और ये प्रवाह होता है मेरे दुखों का मेरे ग़मों का जो मेरे मन से निकल कर वातावरण मे मिल जाते हैं और मैं फिर से तरोताजा हो जाता हूँ मानो कि जीवन की सबसे बड़ी खुशी हांसिल कर ली हो l नदी का शीतल जल जैसे ही मेरे शरीर के संपर्क मे आता है मेरी सारी थकान सारी चिंताएं खत्म हो जाती है और फिर मैं ऊर्जावान हो जाता हूँ l


ढलती हुई शाम का कैसा लुभावना सा ये मंजर है 

बैठा हूं किनारे पर जबकि ख्वाहिश मेरी समुंदर है 

मंद हवा के झोंकों ने जैसे ही छुआ बदन को मेरे 

ग़म को कर के गायब भरा सुकून दिल के अंदर है 


वर्तमान में हर इंसान अपनी अपनी भौतिक आवश्यकताओं एवं जिम्मेदारियों में उलझ कर प्रकृति से काफी दूर होता चला जा रहा है इसकी अहमियत को भूलता जा रहा है l अपने ही निजी स्वार्थ में फंसकर अपने आप के लिए ही वक़्त नहीं निकाल पा रहा है l निश्चित रूप से इसी कारण इंसान नशे के गर्त में भी उतरता जा रहा है जबकि वो यह भूल रहा है कि असली नशा तो इन्हीं प्राकृतिक वातावरण में है जिसका हमे सेवन करते आना चाहिए l

हरे भरे वृक्षों के बीच बेहतर एवं शुद्ध वायु प्रवाह में वो शक्ति है जिससे मानसिक अवसाद के शिकार हो चुके व्यक्तियों के भी मानसिक स्तर में अतुल्य सुधार हो सकता है इस बात को स्वयं वैज्ञानिकों द्वारा भी स्वीकारा गया है l इसके अतिरिक्त प्रकृति से जुड़े हुए इंसान का रचनात्मक स्तर भी उन्नत दर्जे का होता है l

हजारों समस्याओं का एक समाधान ही प्रकृति की वास्तविकता है l 

अजीब है रहस्य इसके, जानने का प्रयास तो कर 

यूं ही नहीं होगा तू खास, पहले कुछ खास तो कर 

बैठ कर इसकी गोद में, दुख दर्द भूल जायगा तू 

बिता थोड़ा वक़्त यहां, सुकून का आभास तो कर 


निसंदेह प्रकृति से जुड़कर मेरे जीवन में जो बदलाव आए है उसके बाद से मुझे हर परिस्थितियां आसान सी नजर आने लगी है l


उम्मीद

 जिंदा है तो जीना होगा l

         क्यों इस तरह से जिंदा है तू ll


इससे तो है मौत ही अच्छी l

         जब यही सोच शर्मिन्दा है तू ll


नया है खेल में बेशक तू l

            है तेरा कोई इतिहास नहीं ll


आजमा कर देख ले बन्दे l

       खाली गया कभी प्रयास नहीं ll


डरता है किस बात से तू l

           हार से क्यों तू हताश हुआ ll


खाल शेर की धारण कर तू l

         नाकामी का ये लिबास नहीं ll


खोज मुश्किलों को अपनी l

             जो कुछ एक चुनिंदा है ll


मुश्किलें यदि आसमाँ सी तो l

       तू खुद भी तो एक परिंदा है ll


भर ले एक उड़ान तू ऊंची l

           तू वहीँ का तो बाशिंदा है ll


जिंदा है तो जीना होगा l

        क्यों इस तरह से जिंदा है ll


सफर

 क्यों हुआ निराश तू, सफर से ओ मुसाफिर l 

ये तो वो लम्हा है, जो यूं ही गुजर जायगा ll


      मंज़िल जब होगी हांसिल , यकीनन l

   तुझे बस ये तेरा सफर ही याद आएगा ll


कितनी कर ले कोशिश, ये वक़्त कभी ठहरा नहीं l

तू खुद गुलाम है इसका, इस पर तेरा पहरा नहीं ll


लाख रोकना चाहेगा तू ,पर वक़्त गुज़रता जायगा l

दुनिया की इस चकाचौंध में, उलझा ही रह जायगा ll


अंत समय में तुझको , ये तेरा सफर ही याद आएगा ll


पैर तेरे जब डगमग होंगे, आँखों से देख न पाएगा l

चाह के भी उठ न सकेगा, एसा वक़्त भी आएगा ll


जीवन का ये फलसफा, जब सिमटता ही जायगा l

अंत समय में तुझको, ये तेरा सफर ही याद आएगा ll


दूर झमेलों से निकल, दुनिया अपनी आबाद कर l

आँखे अपनी बंद कर , फिर गहरी सी एक साँस भर ll


दुख दर्द को अपने भूलकर, तू हल्का आत्मसात कर l

एक सुकूं मिलेगा दिल को,  दिल हल्का हो जायगा ll


भाग दौड़ तू कर ले कितनी, कुछ भी हाथ न आएगा l 

अंत समय में तुझको , ये तेरा सफर ही याद आएगा

प्रेम राही

 एक घने कोहरे से, गुजर रहे है हम इन दिनों l

नजरों के सामने होकर भी, नजर वो आते नहीं ll


दो कदम बढ़ाकर रुक गए वो, और हम चलते रहे l

जो ठहर जाते हम भी, तो ठोकर शायद खाते नहीं ll


राह-ए-इश्क़ भी है अजीब, किस मोड़ पर ले आई l

ग़र कयास होता हमे, इस राह पर कभी जाते नहीं ll


कसूर कहूं इसे दिल का या, ये नजरों की खता है l

हाल ये होता न मेरा, ग़र नजरें हम मिलाते नहीं ll


आखिरी उम्मीद से देखा था, उस बेवफा की तरफ l

नाउम्मीद न होते हम भी, ग़र नजरें वो चुराते नहीं ll


बर्बाद हुए हम तो कुछ ग़म नहीं, खता भी हमारी थी l

ग़र खता न होती इसकी, दिल को हम यूं जलाते नहीं ll


बहुत दूर तलक आ चुके थे, हम इश्क की राह पर l

कोई राह बची होती, तो इश्क में खुद को मिटाते नहीं ll




 













सपनें

 कुछ सपने खरीद लिये मैंने l

                    नींद बेचकर रातों की ll

पूरा करने की, जिद में उन्हें l 

                 कुर्बानी दी जज्बातों की ll


लाख कोशिशें की मैंने, पर l

           तकदीर को जब, न खरीद सका ll 

सौदा ए मुकद्दर, तय न हुआ l

            तो लकीरें बदल दी, हाथों की ll


जिद के आगे झुका नहीं, मैं l

                 मार झेल कर, हालातों की ll

चलता रहा, कभी फ़िक्र न की l

                   राह में बिखरे कांटों की ll


शिद्दत से चाहत थी, जिसकी l

                 जिद से अपनी, पाया उसे ll

लड़ने से कभी, डरा नहीं मैं l

                 मैदान ए जंग, हालातों की ll


चैन भी बेचा, सुकूं भी बेचा l

           बेच दी खुशियाँ, दिल की सारी ll 

झरोखे बेच दिये, आंखों के l

                तन्हा रह गई, आंख बेचारी ll


सपने पूरे किए है, दिल के l

                 बेच के अरमान, दिल के सारे ll

सौदा न था घाटे का यह l

             मंज़िल खुद चल कर है पधारी ll

यादें

 जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है l

खपरैल से पानी का, रिसाव याद आता है ll


        दिल मेरा कहता है, कि उम्र गुजार दू वहां l

       जब ठंड में सुलगता, अलाव याद आता है ll


चंद पैसों के लिए, मैं निकला अपने गांव से l

गुजर रहा हूं मैं, मुश्किल वक़्त के पड़ाव से ll 


       कुछ नहीं रखा, इस शहर की भीड़ भाड में l 

      ऊब गया हूं मैं, अब तो वक़्त के ठहराव से ll 


आज भी उन नहरों का, बहाव याद आता है l 

 जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll


       बैठ पिता के कंधों पर, खेतों में जाना याद है l

       माँ के हाथों से बना, चूल्हे का खाना याद है ll


छुप कर मां से मुझको, नहरों में नहाना याद है l

भोर समय में मुझको, भैंसों को चराना याद है ll


 सांझ समय में मंद हवा का, बहाव याद आता है l

       जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll


एक सुकूं सा मिलता था, गांव की हरियाली में l

मजा चाय का आता था, कुल्हाड़ वाली प्याली में ll


   झूले डाला करते थे, आंगन के पेड़ों की डाली में l

 मजा बहुत आया करता था, दादीजी की गाली में ll


झूले वाली डाली का, वो झुकाव याद आता है l 

जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll


दोपहर धूप में खेलकर, दादी से डरना याद है l

रोज शाम को दादाजी से, बातें करना याद है ll


     पेड़ हिलाकर जेबों में, जामुन का भरना याद है l

      खेल खेल में आपस में, जमकर लड़ना याद है ll 


लड़कर फिर मिल जाने का, स्वभाव याद आता है l

जब कभी भी मुझे, मेरा गांव याद आता है ll






फतेह

 कुछ यूं उलझ कर रह गया मन, अविचल विचार में 

      झपक भी न सकी पलक ये, इंतजार-ए-करार में

 

जर्रा जर्रा वक़्त का यूं, दे रहा था ज़ख्म दिल को 

      छिड़ चुकी थी जंग जैसे, परस्पर इख्तियार में

 

गुफ़्तगू थी जारी दिल की, ख़ामोशियों से रातभर 

     क्यों ख्वाहिशें हांसिल न हुई, ख्वाब के बाजार में

 

मशक्कत में कुछ कमी है या, ये मुद्दत का खेल है 

    तड़प रहा है जो दिल मेरा, मंजिल के ही दीदार में 


जतन न मेरे होंगे कम, अब ख्वाब पूरा होने तक 

    मुश्किलात हो भले ही, कितनी भी लंबी कतार में 


हौंसले चरम पर है, और मंज़िल मेरी निगाहों में 

    खलबली भी उठ चली, अब मेरे रक्त के संचार में 


बदल दूंगा मुकद्दर को, भरोसा जो करूं खुद पर 

   फतह में छुपा है जो मजा, मसर्रत कहां वो हार में 


बांधे सेहरा जीत का, अब लौटूंगा जल्द ही मैं 

    फरामोश बन चुका हूं अब, मैं जीत के एतबार में